धारा 482 CrPC की सीमा: दीवानी विवाद में आपराधिक कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा निर्णय (जनवरी 2026)

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धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आपराधिक कार्यवाही का क्वैशमेंट

सुप्रीम कोर्ट का विस्तृत न्यायिक विश्लेषण

(Criminal Appeal No. 140 of 2026, निर्णय दिनांक 08 जनवरी 2026)


1. भूमिका (Intro – Unique)

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 उच्च न्यायालयों को अंतर्निहित शक्तियाँ प्रदान करती है, जिनका उद्देश्य न्याय के उद्देश्यों की रक्षा करना तथा न्यायालयीय प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है। परंतु यह शक्ति असाधारण है और इसका प्रयोग सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना अपेक्षित है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा Criminal Appeal No. 140 of 2026 में दिया गया निर्णय इस बात को पुनः स्पष्ट करता है कि केवल दीवानी विवाद की उपस्थिति या दीवानी न्यायालय के निर्णय के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को प्रारंभिक स्तर पर निरस्त नहीं किया जा सकता। यह लेख उसी निर्णय का गहन, संरचित और न्यायिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


2. तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (Factual Matrix)

विवाद चेन्नई स्थित मूल्यवान अचल संपत्तियों से संबंधित था, जिनके संबंध में दिवंगत माता-पिता द्वारा अपने जीवनकाल में तीन पंजीकृत सेटलमेंट डीड निष्पादित की गई थीं।
परिवार के सदस्यों के मध्य इन दस्तावेज़ों की वैधता को लेकर पहले दीवानी वाद प्रारंभ हुआ, जिसमें सेटलमेंट डीड को वैध ठहराया गया।
इसके उपरांत, उन्हीं दस्तावेज़ों के संदर्भ में धोखाधड़ी, कूटरचना, जालसाज़ी तथा जाली दस्तावेज़ों के उपयोग के आरोप लगाते हुए आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर FIR एवं चार्जशीट दायर हुई।

उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए आपराधिक कार्यवाही को क्वैश कर दिया कि विवाद मूलतः दीवानी प्रकृति का है और उसे आपराधिक रंग दिया गया है। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।


3. विचारणीय विधिक प्रश्न (Issues for Determination)

  1. क्या उच्च न्यायालय धारा 482 दंप्रसं के अंतर्गत दीवानी विवाद के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर सकता है?
  2. क्या FIR में प्रथम दृष्टया अपराध के तत्व विद्यमान होने के बावजूद उच्च न्यायालय साक्ष्यों की विश्वसनीयता का परीक्षण कर सकता है?
  3. क्या दीवानी वाद में दिया गया निर्णय आपराधिक उत्तरदायित्व को स्वतः समाप्त कर देता है?


4. प्रासंगिक वैधानिक प्रावधान

  • धारा 482, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – अंतर्निहित शक्तियाँ
  • भारतीय दंड संहिता, 1860

    • धारा 417 – छल
    • धारा 420 – धोखाधड़ी
    • धारा 465, 468 – कूटरचना
    • धारा 471 – जाली दस्तावेज़ का उपयोग
    • धारा 120B – आपराधिक षड्यंत्र


5. धारा 482 CrPC : न्यायिक सीमाएँ

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि धारा 482 के अंतर्गत अधिकारों का प्रयोग करते समय उच्च न्यायालय को:

  • Mini Trial करने से बचना चाहिए,
  • FIR/शिकायत में किए गए आरोपों को उनके मुख पर सत्य मानकर देखना चाहिए,
  • साक्ष्यों की पर्याप्तता, विश्वसनीयता या अभियुक्त के बचाव पर विचार नहीं करना चाहिए।


6. पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों का विश्लेषण

(क) State of Haryana v. Bhajan Lal

इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने उन परिस्थितियों की सूची दी, जिनमें FIR को क्वैश किया जा सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह सूची उदाहरणात्मक है, न कि सर्वसमावेशी।

(ख) Neeharika Infrastructure Pvt. Ltd. v. State of Maharashtra

यहाँ यह स्थापित किया गया कि जाँच को प्रारंभिक स्तर पर अवरुद्ध करना अपवाद होना चाहिए, नियम नहीं।

(ग) Kathyayini v. Sidharth P.S. Reddy

न्यायालय ने कहा कि दीवानी और आपराधिक कार्यवाही एक साथ चल सकती हैं, यदि अपराध के तत्व विद्यमान हों।


7. सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण (Judicial Reasoning)

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को त्रुटिपूर्ण माना और कहा कि:

  • दीवानी न्यायालय का निर्णय आपराधिक मंशा (mens rea) का निर्धारण नहीं करता।
  • धोखाधड़ी या कूटरचना जैसे अपराधों में आपराधिक तत्व का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक है।
  • विलंब, शिकायतकर्ता का आचरण अथवा दीवानी वाद में भाग न लेना—ये सभी तथ्य साक्ष्य के मूल्यांकन से संबंधित हैं, न कि धारा 482 के अंतर्गत प्रारंभिक निरस्तीकरण से।


8. (Exact Court Quote – हिंदी अनुवाद)

“जब शिकायत या प्राथमिकी में किए गए आरोपों को उनके मुख पर सत्य मानने पर संज्ञेय अपराध का गठन होता है, तब केवल इस आधार पर कि विवाद में दीवानी तत्व भी विद्यमान है, आपराधिक कार्यवाही को प्रारंभिक चरण में समाप्त नहीं किया जा सकता।”
(निर्णय के पैरा 25–28 के सापेक्ष अनुवादित उद्धरण)


9. निर्णय का सार (Ratio Decidendi)

  • दीवानी वाद का निर्णय आपराधिक अभियोजन पर स्वतः रोक नहीं लगाता।
  • धारा 482 का प्रयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए जहाँ FIR प्रथम दृष्टया अपराध प्रकट न करे।
  • आपराधिक न्याय प्रक्रिया को शॉर्ट-सर्किट करना न्याय के उद्देश्यों के विपरीत है।


10. व्यापक प्रभाव (Wider Legal Impact)

यह निर्णय विशेष रूप से भूमि विवाद, पारिवारिक संपत्ति विवाद एवं सेटलमेंट डीड से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण है, जहाँ अक्सर दीवानी और आपराधिक कार्यवाही समानांतर चलती हैं।
यह उच्च न्यायालयों को यह स्मरण कराता है कि वे धारा 482 के अंतर्गत संयम और न्यायिक अनुशासन बनाए रखें।


11. निष्कर्ष (Conclusion)

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय धारा 482 दंप्रसं की सीमाओं को पुनः परिभाषित करता है और यह स्पष्ट करता है कि न्यायिक हस्तक्षेप का उद्देश्य अभियोजन को दबाना नहीं, बल्कि न्याय को संरक्षित करना है। जहाँ तथ्यात्मक विवाद और आपराधिक मंशा का प्रश्न हो, वहाँ परीक्षण ही उचित मार्ग है।


लेखक

Satyam Shukla
Advocate & Legal Researcher
IndianLawFact


अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख केवल शैक्षणिक एवं विधिक शोध के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें प्रस्तुत विश्लेषण किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह या मत नहीं है। पाठकों से अपेक्षा है कि वे किसी भी व्यावहारिक निर्णय से पूर्व स्वतंत्र विधिक परामर्श प्राप्त करें।


Internal Linking (Suggested)

  • धारा 482 CrPC : न्यायिक व्याख्या

  • दीवानी एवं आपराधिक उत्तरदायित्व का सह-अस्तित्व

  • Bhajan Lal Guidelines : व्यावहारिक अनुप्रयोग


स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का रिपोर्टेबल निर्णय, Criminal Appeal No. 140 of 2026, दिनांक 08.01.2026 


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