एकपक्षीय दीवानी निर्णय, खतौनी प्रविष्टि एवं स्वामित्व निर्धारण
Regular Civil Appeal No. 37/2022 (Manager v. Ramlakhan) – विश्लेषणात्मक अध्ययन
1. भूमिका (Introduction)
दीवानी वादों में भूमि स्वामित्व से संबंधित विवादों में अक्सर खतौनी प्रविष्टि, बैनामा निष्पादन, तथा एकपक्षीय (Ex Parte) निर्णय जैसे प्रश्न निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
प्रस्तुत अपील में न्यायालय के समक्ष मूल प्रश्न यह था कि क्या केवल राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज होने मात्र से किसी पक्ष को विवादित संपत्ति का वैध स्वामी माना जा सकता है, विशेषतः तब जब वाद का निस्तारण एकपक्षीय रूप से किया गया हो।
2. वाद की संक्षिप्त पृष्ठभूमि
- मूल वाद संख्या: 171/2017
- प्रकृति: बैनामा निरस्तीकरण एवं स्वामित्व विवाद
- विवादित भूमि: ग्राम बिल्ली मार्कुंडी, परगना अगोरी, तहसील रॉबर्ट्सगंज, जनपद सोनभद्र
वादियों का दावा:
- भूमि पर उनका कब्जा एवं वैधानिक स्वामित्व
- प्रतिवादी संख्या-1 के पास विक्रय का कोई विधिक अधिकार नहीं
- निचली अदालत द्वारा दिनांक 31.05.2022 को वाद एकपक्षीय रूप से निरस्त किया गया
इसी आदेश के विरुद्ध वर्तमान नियमित दीवानी अपील प्रस्तुत की गई।
3. विचारणीय विधिक प्रश्न (Issues for Determination)
अपील न्यायालय द्वारा निम्न प्रमुख प्रश्नों पर विचार किया गया:
- क्या निचली अदालत द्वारा एकपक्षीय कार्यवाही में उपलब्ध साक्ष्यों का सम्यक् मूल्यांकन किया गया?
- क्या केवल खतौनी में नाम दर्ज होने से स्वामित्व स्वतः सिद्ध हो जाता है?
- क्या विवादित संपत्ति के स्वामित्व का निर्धारण बिना पूर्ण साक्ष्य एवं सुनवाई के किया जा सकता है?
4. प्रासंगिक वैधानिक प्रावधान
(क) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908
- धारा 96(2) – एकपक्षीय डिक्री के विरुद्ध अपील का अधिकार
- आदेश IX – पक्षकारों की अनुपस्थिति में कार्यवाही से संबंधित सिद्धांत
(ख) साक्ष्य विधि के सामान्य सिद्धांत
- दस्तावेजी साक्ष्य का परीक्षण
- राजस्व अभिलेखों का सीमित प्रमाणिक मूल्य
5. निचली अदालत के दृष्टिकोण का विश्लेषण
निचली अदालत ने मुख्यतः इस आधार पर वाद खारिज किया कि खतौनी में प्रतिवादी संख्या-1 का नाम दर्ज था, जिससे उसे भूमि विक्रय का अधिकार प्राप्त माना गया।
अपील न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को अपर्याप्त और विधि के प्रतिकूल माना।
6. अपीलीय न्यायालय का न्यायिक विश्लेषण
अपीलीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
- स्वामित्व का प्रश्न तथ्य और विधि का मिश्रित प्रश्न है।
- केवल राजस्व अभिलेख (खतौनी) निर्णायक नहीं हो सकते।
- एकपक्षीय निर्णय में न्यायालय का दायित्व और अधिक बढ़ जाता है कि वह उपलब्ध साक्ष्यों का गहन परीक्षण करे।
न्यायालय का शब्दशः उद्धरण (Exact Quotation):
“केवल खतौनी में नाम दर्ज हो जाने मात्र से यह विधि-सम्मत रूप से नहीं माना जा सकता कि संबंधित व्यक्ति विवादित संपत्ति का स्वामी है।”
7. सर्वोच्च न्यायालय की प्रासंगिक मिसाल
अपीलीय न्यायालय ने निम्न निर्णय पर भरोसा किया:
Supreme Court of India
V. प्रभाकर बनाम बसवराज, (2022) 1 SCC 115
इस निर्णय में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि:
यदि निचली अदालत का निर्णय प्रक्रियात्मक त्रुटि, अपर्याप्त साक्ष्य मूल्यांकन, या न्यायिक विवेक के अभाव पर आधारित हो, तो अपीलीय न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
8. अपीलीय निर्णय का निष्कर्ष (Findings)
अपीलीय न्यायालय ने यह पाया कि:
- निचली अदालत द्वारा स्वामित्व का निर्धारण बिना समुचित परीक्षण के किया गया
- एकपक्षीय निर्णय में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ
- विवादित संपत्ति के स्वामित्व का निर्णय पुनः विचारणीय है
फलस्वरूप, अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का आदेश निरस्त किया गया तथा वाद को पुनः विचार हेतु वापस भेजा गया।
9. लेखक (Author)
Satyam Shukla
Advocate & Legal Researcher
(भूमि कानून, सिविल प्रक्रिया एवं संवैधानिक विधि पर केंद्रित अध्ययन)
10. अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख केवल शैक्षणिक एवं विधिक शोध उद्देश्य से लिखा गया है।
यह किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह, राय या परामर्श नहीं है।
लेख में व्यक्त विचार न्यायालयीन निर्णय के विश्लेषण तक सीमित हैं।

