**SC/ST अधिनियम का दुरुपयोग:
सोनभद्र न्यायालय के आदेश के संदर्भ में एक कानूनी विश्लेषण**
(SC/ST Act Misuse – Sonbhadra Court Order Legal Analysis in Hindi)
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 भारतीय समाज के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा कानूनों में से एक है। इसका उद्देश्य सदियों से उत्पीड़न झेल रहे वर्गों को कानूनी संरक्षण प्रदान करना और उनके सम्मान व गरिमा की रक्षा करना है। किंतु बीते कुछ वर्षों में न्यायालयों के समक्ष यह प्रश्न भी बार-बार उठा है कि क्या इस कानून का कुछ मामलों में दुरुपयोग हो रहा है?
सोनभद्र जनपद की विशेष SC/ST अदालत में विचाराधीन राज्य सरकार बनाम मैरून खातून (सेशन ट्रायल संख्या 50/2022) से जुड़ा हालिया आदेश इस बहस को एक बार फिर प्रासंगिक बना देता है।
SC/ST अधिनियम का उद्देश्य और कानूनी ढांचा
SC/ST अधिनियम का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:
- अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यक्तियों के साथ भेदभाव, हिंसा या अपमान न हो,
- दोषियों को त्वरित और कठोर दंड मिले,
- और पीड़ितों को न्यायिक प्रक्रिया में सुरक्षा मिले।
इसी कारण इस अधिनियम में:
- जमानत पर सख़्ती,
- विशेष अदालतों का गठन,
- और त्वरित सुनवाई का प्रावधान किया गया है।
यह कानून संविधान के अनुच्छेद 17, 21 और 46 की भावना को लागू करता है।
सोनभद्र का मामला: संक्षिप्त पृष्ठभूमि
सोनभद्र न्यायालय के आदेश के अनुसार:
- अभियुक्ता पर IPC की धाराएँ 323, 504 और 506 लगाई गईं,
- साथ ही SC/ST Act की धारा 3(2)(v-a) जोड़ी गई।
यह धारा तभी लागू होती है जब:
- पीड़ित अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य हो, और
- अपराध उसी जातिगत पहचान के कारण किया गया हो।
यह मामला 2021 की घटना से संबंधित है, जो 2022 में सेशन ट्रायल के रूप में दर्ज हुआ। न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह है कि क्या आरोपित कृत्य वास्तव में SC/ST अधिनियम की कठोर धाराओं के अंतर्गत आता है या नहीं।
SC/ST अधिनियम के दुरुपयोग की न्यायिक चिंता
भारतीय न्यायपालिका ने कई निर्णयों में यह स्वीकार किया है कि:
“हर सामाजिक सुरक्षा कानून की तरह SC/ST अधिनियम भी दुरुपयोग से अछूता नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
- Subhash Kashinath Mahajan बनाम State of Maharashtra (2018)
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिनियम का उद्देश्य संरक्षण है, न कि निर्दोषों को परेशान करना।
- Prathvi Raj Chauhan बनाम Union of India (2020)
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया मामला न बनने पर अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।
इन फैसलों से यह सिद्ध होता है कि संतुलन आवश्यक है—न तो वास्तविक पीड़ितों के अधिकार कमजोर हों, और न ही कानून को दबाव के हथियार की तरह प्रयोग किया जाए।
दुरुपयोग किस रूप में सामने आता है?
व्यावहारिक अनुभव में कुछ समस्याएँ उभरकर आई हैं:
- व्यक्तिगत या पारिवारिक विवादों को जातिगत रंग देना,
- सामान्य मारपीट के मामलों में SC/ST एक्ट जोड़ देना,
- जिससे आरोपी की जमानत कठिन हो जाती है,
- और न्यायिक प्रक्रिया दंडात्मक प्रतीत होने लगती है।
हालाँकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हर मामला दुरुपयोग नहीं होता, लेकिन जहाँ ऐसा होता है, वहाँ न्यायालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
न्यायालय की भूमिका: कानून और न्याय के बीच संतुलन
सोनभद्र जैसे मामलों में अदालतों को यह देखना होता है कि:
- क्या FIR और साक्ष्य प्रथम दृष्टया जातिगत द्वेष को दर्शाते हैं,
- क्या आरोप केवल धाराएँ जोड़ने तक सीमित हैं या ठोस प्रमाण मौजूद हैं,
- और क्या SC/ST अधिनियम का प्रयोग उसके वास्तविक उद्देश्य के अनुरूप है।
आज की न्यायिक प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि अदालतें:
“कानून की आत्मा को महत्व दे रही हैं,न कि केवल उसके शब्दों को।”
SC/ST अधिनियम और समाज पर प्रभाव
यदि कानून का दुरुपयोग होता है तो:
- वास्तविक पीड़ितों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है,
- न्यायिक प्रणाली पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है,
- और सामाजिक तनाव उत्पन्न होता है।
वहीं दूसरी ओर, यदि कानून को कमजोर किया जाए तो:
- वास्तविक अत्याचार पीड़ित असुरक्षित हो सकते हैं।
इसी कारण न्यायपालिका द्वारा अपनाया गया संतुलित दृष्टिकोण ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है।
निष्कर्ष
सोनभद्र न्यायालय में लंबित यह मामला इस व्यापक कानूनी प्रश्न को उजागर करता है कि SC/ST अधिनियम का प्रयोग कहाँ संरक्षण है और कहाँ संभावित दुरुपयोग।
यह कानून निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन:
- इसका प्रयोग न्याय के लिए होना चाहिए, प्रतिशोध के लिए नहीं,
- और अदालतों को प्रत्येक मामले में तथ्यों व साक्ष्यों की कसौटी पर निर्णय लेना चाहिए।

