जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, Maneka Gandhi case, Article 21 landmark judgment

indianlawfact
0

 मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978): अनुच्छेद 21 का ऐतिहासिक विस्तार

अनुच्छेद 21 का विस्तार – मेनका गांधी बनाम भारत संघ 1978

परिचय

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 नागरिकों को “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का संरक्षण देता है। परंतु 1978 तक इसकी व्याख्या संकीर्ण थी। मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने इस स्थिति को मौलिक रूप से बदल दिया और अनुच्छेद 21 को न्याय, गरिमा और निष्पक्षता से जोड़ा। यही कारण है कि यह फैसला भारतीय संवैधानिक कानून का मील का पत्थर माना जाता है।

पृष्ठभूमि

1977 में केंद्र सरकार ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 10(3)(c) के अंतर्गत मेनका गांधी का पासपोर्ट “सार्वजनिक हित” में जब्त कर लिया। न तो कारण बताए गए, न ही सुनवाई का अवसर दिया गया। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

विधिक प्रश्न

  1. क्या पासपोर्ट जब्ती अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है?
  2. “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का अर्थ क्या केवल वैधानिक औपचारिकता है?
  3. क्या अनुच्छेद 14, 19 और 21 परस्पर जुड़े हैं?

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

संविधान पीठ ने कहा कि:

  • “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” न्यायपूर्ण, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए।
  • अनुच्छेद 14 (समानता), 19 (स्वतंत्रताएँ) और 21 अलग-थलग नहीं, बल्कि एकीकृत हैं।
  • यदि कोई कानून अनुच्छेद 21 को प्रभावित करता है, तो उसे 14 और 19 की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा।

यह व्याख्या अमेरिकी Due Process of Law सिद्धांत के सार को भारतीय संवैधानिक ढांचे में समाहित करती है।

अनुच्छेद 21 का विस्तार

इस निर्णय के बाद अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अनेक अधिकार विकसित हुए, जैसे—

  • विदेश यात्रा का अधिकार
  • गरिमा के साथ जीवन का अधिकार
  • निष्पक्ष प्रक्रिया और सुनवाई का अधिकार
  • कानूनी सहायता और शीघ्र न्याय
  • स्वच्छ पर्यावरण
  • गोपनीयता (आगे चलकर Puttaswamy)

A.K. Gopalan से विच्छेद

1950 के A.K. Gopalan निर्णय में अनुच्छेद 21 की संकीर्ण व्याख्या थी। मेनका गांधी ने उस दृष्टिकोण को समाप्त कर अधिकारों को जीवंत और गतिशील बनाया।

महत्व और प्रभाव

  • कार्यपालिका की मनमानी पर संवैधानिक नियंत्रण।
  • मौलिक अधिकारों का मानव-केंद्रित विस्तार।
  • बाद के ऐतिहासिक निर्णयों की नींव।

निष्कर्ष

मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने यह स्थापित किया कि जीवन केवल अस्तित्व नहीं, बल्कि न्याय, निष्पक्षता और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है—यही अनुच्छेद 21 का वास्तविक विस्तार है।

अस्वीकरण

Disclaimer: यह वीडियो केवल सामान्य कानूनी जानकारी एवं शैक्षणिक उद्देश्य से बनाया गया है। इसे किसी विशेष मामले में कानूनी सलाह न समझा जाए।

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

Please Select Embedded Mode To show the Comment System.*

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Accept !
close