अनुच्छेद 21 का ऐतिहासिक निर्णय: ए.के. गोपालन बनाम राज्य मद्रास (1950)
प्रस्तावना
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 आज गरिमा के साथ जीवन और न्यायसंगत प्रक्रिया का प्रतीक है, लेकिन 1950 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी एक संकीर्ण व्याख्या की थी। ए.के. गोपालन बनाम राज्य मद्रास पहला ऐसा मामला था, जिसमें अनुच्छेद 21 की वास्तविक सीमाएँ सामने आईं।
मामले की पृष्ठभूमि
ए.के. गोपालन एक प्रमुख कम्युनिस्ट नेता थे। उन्हें Preventive Detention Act, 1950 के अंतर्गत हिरासत में लिया गया। यह कानून सरकार को बिना मुकदमा चलाए व्यक्ति को निरुद्ध करने की शक्ति देता था।
मुख्य संवैधानिक प्रश्न
- क्या Preventive Detention Act अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है?
- क्या अनुच्छेद 19 और 21 को साथ पढ़ा जाना चाहिए?
- “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का वास्तविक अर्थ क्या है?
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
न्यायालय ने बहुमत से कहा कि यदि किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार स्वतंत्रता से वंचित किया गया है, तो वह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं है। अदालत ने प्रक्रिया की न्यायसंगतता की जांच से इनकार किया।
अनुच्छेद 19 और 21 का पृथक्करण
न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 19 केवल मुक्त नागरिकों पर लागू होता है, जबकि निरुद्ध व्यक्ति अनुच्छेद 21 के दायरे में आते हैं।
अल्पमत मत (Justice Fazl Ali)
न्यायमूर्ति फज़ल अली ने कहा कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 को संयुक्त रूप से पढ़ा जाना चाहिए और केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है—वह कानून न्यायपूर्ण भी होना चाहिए।
निर्णय की आलोचना
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमित समझ
- न्यायिक समीक्षा की शक्ति को कम करना
- मानवाधिकार दृष्टिकोण का अभाव
बाद के निर्णयों में बदलाव
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या की और कहा कि प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए।
https://indianlawfact.blogspot.com/2025/12/maneka-gandhi-case-article-21-landmark.html
निष्कर्ष
ए.के. गोपालन बनाम राज्य मद्रास ने भले ही अनुच्छेद 21 को सीमित किया, लेकिन इसी निर्णय ने भविष्य के प्रगतिशील संवैधानिक विकास की नींव रखी।
Disclaimer
यह लेख केवल शैक्षणिक एवं सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसे कानूनी सलाह न माना जाए। किसी विशेष मामले में योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है।

