D.K. Basu v. State of West Bengal (1997)

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D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) – पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों का मील का पत्थर फैसला

भारतीय न्यायपालिका ने कई अवसरों पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) उन्हीं महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक है, जिसने पुलिस हिरासत में होने वाली यातना, कस्टोडियल डेथ और मानवाधिकार उल्लंघन को रोकने के लिए मजबूत दिशानिर्देश तय किए।

यह फैसला आज भी हर पुलिस अधिकारी, वकील, छात्र और आम नागरिक के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ है।




केस की पृष्ठभूमि

1980 और 90 के दशक में भारत में पुलिस हिरासत में मौत और यातना की घटनाएँ लगातार बढ़ रही थीं।
इन्हीं घटनाओं से चिंतित होकर समाजसेवी डी.के. बसु ने सुप्रीम कोर्ट को एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) लिख भेजा।

उन्होंने कोर्ट से मांग की कि—

  • कस्टोडियल टॉर्चर पर रोक लगे
  • पुलिस गिरफ्तारी पर स्पष्ट नीतियाँ बने
  • आरोपी के अधिकारों की रक्षा की जाए

सुप्रीम कोर्ट ने इस चिट्ठी को एक याचिका के रूप में स्वीकार कर सुनवाई शुरू की।


सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

5 दिसंबर 1996 (रिपोर्ट 1997) को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश पारित किया।
कोर्ट ने कहा:

“कस्टोडियल टॉर्चर, किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक और अस्वीकार्य है। गिरफ्तारी कोई लाइसेंस नहीं कि पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों को कुचल दिया जाए।”

कोर्ट ने 11 अनिवार्य दिशानिर्देश (Guidelines) जारी किए, जो पुलिस गिरफ्तारी और पूछताछ के दौरान पालन किए जाने आवश्यक हैं।


D.K. Basu केस में जारी 11 प्रमुख दिशानिर्देश

1. गिरफ्तारी के समय स्पष्ट पहचान

पुलिस अधिकारी अपनी नाम-पट्टी और पहचान उजागर करेंगे।

2. गिरफ्तारी का मेमो तैयार होगा

गिरफ्तारी समय, तारीख और गवाह (परिवार/स्थानीय जिम्मेदार व्यक्ति) के हस्ताक्षर आवश्यक।

3. गिरफ्तार व्यक्ति को अपने परिवार/दोस्त को सूचना देने का अधिकार

अरेस्ट की जानकारी तुरन्त दी जाएगी।

4. गिरफ्तारी की सूचना थाने में दर्ज होगी

5. गिरफ्तार व्यक्ति की मेडिकल जांच

हर 48 घंटे में डॉक्टर द्वारा मेडिकल एग्जामिनेशन अनिवार्य है।

6. केस डायरी का रख-रखाव

पूछताछ के दौरान सटीक रिकॉर्ड रखना जरूरी।

7. फोन, टेलीग्राम या संदेश भेजने की सुविधा

8. वकील की मौजूदगी में पूछताछ (यदि मांगी जाए)

9. पुलिस नियंत्रण कक्ष में गिरफ्तारी की सूचना

हर जिला/राज्य के कंट्रोल रूम में सूचना भेजना जरूरी।

10. अदालत को समय पर प्रस्तुत करना

24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश करना अनिवार्य।

11. मानवाधिकारों का सम्मान सर्वोपरि

किसी भी प्रकार की मारपीट, यातना या अमानवीय व्यवहार पर पूर्ण प्रतिबंध।


यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

✔️ भारत में कस्टोडियल टॉर्चर के खिलाफ पहली बार इतने स्पष्ट नियम बने
✔️ पुलिस को जिम्मेदार बनाने की दिशा में यह सबसे बड़ा कदम था
✔️ आम नागरिकों को अपने अधिकारों की जानकारी मिली
✔️ मानवाधिकारों और आर्टिकल 21 (जीवन और स्वतंत्रता) को सशक्त किया गया

यह फैसला बताता है कि—

“गिरफ्तारी केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है।”


निष्कर्ष

D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) ने भारतीय पुलिस प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और मानवाधिकार संरक्षण की नई शुरुआत की।

आज भी यह केस गिरफ्तारी, पूछताछ और पुलिस सुधारों का आधार माना जाता है।
हर नागरिक को यह दिशानिर्देश जानना चाहिए ताकि वह अपने अधिकारों की रक्षा कर सके।

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