Bachan Singh v. State of Punjab (1990) — “रेयर ऑफ द रेयरेस्ट” सिद्धांत का आधार
भारत में मृत्यु दंड (Death Penalty) लंबे समय से बहस का विषय रहा है। क्या यह सज़ा आवश्यक है? क्या यह मानवाधिकारों के खिलाफ है? क्या यह अपराध रोकने में मदद करती है?
इन सभी सवालों को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने Bachan Singh v. State of Punjab (1990) केस में गहराई से समझा और एक ऐतिहासिक निर्णय दिया।
यह केस आज “रेयर ऑफ द रेयरेस्ट” (Rarest of the Rare) का आधार माना जाता है।

⭐ केस की पृष्ठभूमि (Background)
बचन सिंह पर हत्या का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने उसे मृत्यु दंड सुनाया, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ सवाल केवल अपराध का नहीं था—
सवाल था: क्या किसी व्यक्ति को मौत की सज़ा देना संविधान के खिलाफ है?
⭐ मुख्य मुद्दे (Issues Before the Court)
- क्या मृत्युदंड अनुच्छेद 21 (Right to Life) का उल्लंघन है?
- क्या IPC की धारा 302 में मृत्यु दंड का प्रावधान असंवैधानिक है?
- क्या सजा तय करते समय आरोपी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, सुधार की संभावना और परिस्थिति को ध्यान में रखा जाना चाहिए?
⭐ सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Judgment)
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि:
✔ मृत्यु दंड संविधान-सम्मत है,
लेकिन केवल उन्हीं मामलों में दिया जाना चाहिए जिनमें —
“अपराध इतना भयावह, अमानवीय और समाज को झकझोरने वाला हो कि आजीवन कारावास भी पर्याप्त न लगे।”
यही सिद्धांत आज Rarest of the Rare Doctrine के नाम से जाना जाता है।
कोर्ट ने कहा कि जज को सजा देते समय इन बातों पर ध्यान देना चाहिए:
🔹 अपराध की प्रकृति🔹 आरोपी के व्यक्तित्व और पृष्ठभूमि🔹 सुधार की संभावना (Possibility of Reform)🔹 क्या आजीवन कारावास पर्याप्त नहीं है?
⭐ निर्णय के मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
1️⃣ रेयर ऑफ द रेयरेस्ट सिद्धांत स्थापित हुआ
अब हर हत्या में मृत्युदंड नहीं—
केवल बेहद घृणित और क्रूर मामलों में ही दिया जा सकता है।
2️⃣ सजा तय करते समय संतुलन (Balance Sheet Theory)
कोर्ट को अपराध बनाम अपराधी दोनों को तौलना चाहिए।
3️⃣ मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक
आरोपी के सुधार की संभावना समाप्त होने पर ही मृत्यु दंड अंतिम विकल्प बनना चाहिए।
4️⃣ मृत्यूदंड “रूल” नहीं, बल्कि “एक्सेप्शन”
यानी यह एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति में लागू होने वाली सज़ा है।
⭐ इस केस का भारतीय न्याय व्यवस्था पर प्रभाव (Impact)
Bachan Singh निर्णय ने भारत में मृत्यु दंड की अवधारणा को पूरी तरह बदल दिया।
अब:
- हर हत्या के बाद मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता।
- आरोपी की मानसिक स्थिति, जीवन-परिस्थितियों और सुधार की संभावना को महत्व दिया जाता है।
- जजों पर यह जिम्मेदारी बढ़ गई कि वे यह साबित करें कि “क्यों इस केस में मृत्यु दंड ही उचित है।”
इस केस का प्रभाव आगे आने वाले कई बड़े फैसलों में देखा गया, जैसे —
⭐ निष्कर्ष (Conclusion)
Bachan Singh v. State of Punjab (1990) भारतीय दंड न्यायशास्त्र का एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसने यह सुनिश्चित किया कि —
“मृत्यु दंड केवल उसी स्थिति में दिया जाए जब अपराध समाज के लिए असहनीय हो।”
यह फैसला अपराधी के सुधार की संभावना, मानवाधिकारों और न्याय के संतुलन को बरकरार रखता है।
