Special Trial/44/2015 (UPSB010014952015)
1. प्रस्तावना
यह लेख अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अंतर्गत विचारित एक विशेष विचारण (Special Trial) का न्यायिक-शोधात्मक विवेचन प्रस्तुत करता है। उद्देश्य निर्णय में अपनाए गए कानूनी मानकों, साक्ष्य-मूल्यांकन और न्यायिक तर्क को तटस्थ रूप में संक्षेपित करना है।
“Sonbhadra SC/ST Court का निर्णय – Special Trial/44/2015”
2. प्रकरण की संक्षिप्त पृष्ठभूमि
- अपराध संख्या: 171/2013, थाना करमा, जनपद सोनभद्र
- आरोप: भारतीय दंड संहिता की धाराएँ 323, 325, 504, 506 तथा SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(x) (तत्कालीन)
- प्रक्रिया: धारा 156(3) दंप्रसं के अंतर्गत आदेश; विवेचना उपरांत आरोप-पत्र; सत्र सुपुर्दगी; विशेष न्यायालय में विचारण।
- विशेष तथ्य: विचारण के दौरान एक अभियुक्त (राजीव उर्फ राजू) का देहांत; शेष अभियुक्तों के विरुद्ध विचारण जारी।
3. विचारण में साक्ष्य (Evidence Matrix)
- अभियोजन साक्ष्य: कुल पाँच गवाह (पीड़िता/घायल, सह-घायल/प्रत्यक्षदर्शी, विवेचक, चिकित्सक)।
- चिकित्सकीय साक्ष्य: चोटों का परीक्षण; चोटों की प्रकृति साधारण; समयानुकूलता पर विचार।
- दस्तावेजी साक्ष्य: FIR/आवेदन, विवेचना-दस्तावेज, चिकित्सकीय रिपोर्ट, स्थल-नक्शा।
- न्यायालय ने मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य का समग्र मूल्यांकन किया।
4. विचारणीय विधिक प्रश्न (Issues)
- क्या अभियोजन आरोपित तिथि-समय-स्थान पर मारपीट/धमकी/अपमान सिद्ध कर सका?
- क्या SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(x) (तत्कालीन) के आवश्यक तत्व संदेह से परे सिद्ध हुए?
- क्या चिकित्सकीय साक्ष्य IPC धारा 325 (गंभीर चोट) के स्तर तक आरोप सिद्ध करता है?
5. वैधानिक प्रावधान (Statutory Provisions)
IPC:
- धारा 323 (साधारण चोट),
- धारा 325 (गंभीर चोट),
- धारा 504 (जानबूझकर अपमान),
- धारा 506 (आपराधिक धमकी)।
SC/ST अधिनियम, 1989:
- धारा 3(1)(x) (तत्कालीन) — जातिसूचक अपमान/अपदर्शन।
दंप्रसं:
- धारा 156(3) (न्यायालयीय आदेश से FIR/विवेचना),
- धारा 313 (अभियुक्त का बयान),
- धारा 437 (जमानत/बंधपत्र)।
परिवीक्षा अधिनियम, 1958:
धारा 4 (परिवीक्षा का लाभ)।
6. न्यायिक विश्लेषण और तर्क (Reasoning)
6.1 FIR में विलंब
न्यायालय ने विलंब के यथोचित स्पष्टीकरण को स्वीकार किया और इसे अभियोजन के लिए घातक नहीं माना।
6.2 IPC आरोपों का मूल्यांकन
- धारा 323/504/506: प्रत्यक्षदर्शी एवं चिकित्सकीय साक्ष्य के आधार पर आरोप सिद्ध माने गए।
- धारा 325: चिकित्सकीय/एक्स-रे साक्ष्य की अपूर्णता के कारण गंभीर चोट का आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हुआ।
6.3 SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(x)
न्यायालय ने यह सिद्धांत लागू किया कि केवल पीड़ित का अनुसूचित जाति/जनजाति का सदस्य होना पर्याप्त नहीं; अभियोजन को यह भी सिद्ध करना होता है कि अपराध जातिगत कारण से किया गया। साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन पर यह तत्व सिद्ध नहीं पाया गया।
7. संदर्भित न्यायिक दृष्टांत (Case Law References)
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के उन निर्णयों के सिद्धांतों का उल्लेख किया जिनमें यह प्रतिपादित है कि SC/ST अधिनियम के अंतर्गत दोषसिद्धि हेतु mens rea/जातिगत कारण का ठोस प्रमाण आवश्यक है, जैसे—
- Gorige Pentaiah v. State of A.P. (2008) 12 SCC 531
- Swaran Singh v. State (2008) 8 SCC 435
- Khuman Singh v. State of M.P. (2019)
8. निष्कर्ष (Findings)
- अभियुक्तों को IPC धारा 323/504/506 में दोषसिद्ध किया गया।
- IPC धारा 325 तथा SC/ST अधिनियम धारा 3(1)(x) के आरोपों से दोषमुक्त किया गया।
- दंड निर्धारण के चरण में न्यायालय ने परिस्थितियों, दीर्घकालीन विचारण और अभियुक्तों की पृष्ठभूमि पर विचार करते हुए परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 4 का लाभ प्रदान किया, आवश्यक बंधपत्र/शर्तों सहित।
9. उपसंहार
यह निर्णय SC/ST अधिनियम के मामलों में आवश्यक तत्वों की कड़ी जांच, साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण, तथा IPC अपराधों में चिकित्सकीय साक्ष्य की भूमिका को रेखांकित करता है। साथ ही, यह सिद्धांत पुष्ट करता है कि दंड न्याय में दोषसिद्धि संदेह से परे प्रमाण पर ही आधारित होनी चाहिए।
अस्वीकरण
यह लेख केवल अकादमिक/शोध उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें कानूनी सलाह या किसी प्रकार का मार्गदर्शन अभिप्रेत नहीं है।
FAQ:
❓ SC/ST एक्ट में दोषसिद्धि के लिए क्या आवश्यक है?
SC/ST एक्ट के अंतर्गत यह सिद्ध करना आवश्यक है कि कथित अपराध पीड़ित की जाति के कारण किया गया।
❓ क्या केवल जातिसूचक शब्दों का प्रयोग पर्याप्त है?
नहीं। न्यायालय के अनुसार अभियोजन को यह भी सिद्ध करना होता है कि शब्दों का प्रयोग जानबूझकर और जातिगत अपमान की मंशा से किया गया।
❓ IPC धारा 325 कब लागू होती है?
जब चिकित्सकीय साक्ष्य से गंभीर चोट (fracture आदि) स्पष्ट रूप से सिद्ध हो।
❓ FIR में देरी होने पर केस खारिज हो जाता है?
नहीं। यदि देरी का युक्तिसंगत स्पष्टीकरण हो, तो FIR स्वीकार्य रहती है।
❓ परिवीक्षा अधिनियम का लाभ कब दिया जा सकता है?
जब अभियुक्त का पूर्व आपराधिक इतिहास न हो और परिस्थितियाँ सुधारात्मक दृष्टिकोण की अनुमति दें।
“यह लेख न्यायालय के निर्णय का व्याख्यात्मक विश्लेषण (Judgment Explained in Hindi) प्रस्तुत करता है।”
Author: Legal Researcher | Criminal Law | SC/ST Act
Disclaimer: Academic & Research Purpose Only

