Wazid & Ors. v. State of Uttar Pradesh & Ors. (2025)
व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मनमानी पुलिस कार्यवाही और संवैधानिक संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
🔰 प्रस्तावना
भारतीय संविधान का मूल उद्देश्य नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और विधि के शासन की रक्षा करना है। अनुच्छेद 21 (Article 21) यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के बिना वंचित नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद, व्यवहार में कई बार पुलिस या प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग देखने को मिलता है, जहाँ बिना ठोस आधार के आपराधिक कार्यवाही, बार-बार थाने बुलाना, मानसिक दबाव और धमकी जैसी स्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं।

Wazid & Ors. v. State of Uttar Pradesh & Ors., W.P. (Crl.) No. 450/2024, में 22 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय इसी पृष्ठभूमि में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मील का पत्थर है। यह फैसला न केवल याचिकाकर्ताओं को राहत देता है, बल्कि पुलिस की मनमानी पर स्पष्ट संवैधानिक सीमाएँ भी निर्धारित करता है।
🧾 मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)
इस मामले में याचिकाकर्ता Wazid एवं अन्य ने उत्तर प्रदेश राज्य और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि—
- उनके विरुद्ध बिना पर्याप्त साक्ष्य के आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई
- विधिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया
- पुलिस द्वारा धमकी, उत्पीड़न और अवैध दबाव बनाया गया
- उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का उल्लंघन हुआ
याचिकाकर्ताओं ने इसे सीधे-सीधे Article 21 का उल्लंघन बताते हुए न्यायालय से संरक्षण की मांग की।
⚖️ उठाए गए मुख्य विधिक प्रश्न (Key Legal Issues)
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निम्नलिखित प्रश्न प्रमुख रूप से विचारणीय थे—
- क्या बिना ठोस आधार और उचित प्रारंभिक जांच के आपराधिक कार्यवाही शुरू की जा सकती है?
- क्या पुलिस को केवल संदेह के आधार पर नागरिकों को परेशान करने का अधिकार है?
- क्या ऐसी कार्यवाही Article 14 (समानता का अधिकार) और Article 21 का उल्लंघन है?
- क्या न्यायालय ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है जहाँ प्रथम दृष्टया मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा हो?
🧑⚖️ याचिकाकर्ताओं के तर्क (Arguments by Petitioners)
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह दलील दी गई कि—
- FIR और जांच पूर्वाग्रहपूर्ण एवं दुर्भावनापूर्ण (malafide) है
- कानून का प्रयोग उत्पीड़न के हथियार के रूप में किया जा रहा है
- पुलिस की कार्रवाई मनमानी और असंवैधानिक है
- गिरफ्तारी का कोई ठोस आधार न होते हुए भी लगातार मानसिक दबाव बनाया जा रहा है
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कानून का उपयोग बदले, डराने या प्रताड़ना के लिए नहीं किया जा सकता।
🏛️ राज्य सरकार के तर्क (Arguments by the State)
राज्य सरकार की ओर से यह कहा गया कि—
- पुलिस ने कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई की
- कुछ प्रारंभिक सामग्री (prima facie material) उपलब्ध थी
- जांच अभी प्रारंभिक चरण में है, इसलिए न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए
हालाँकि, राज्य पक्ष आरोपों के समर्थन में स्पष्ट और ठोस सामग्री प्रस्तुत करने में असफल रहा।
📜 सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (Judgment of the Supreme Court)
22 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कड़ी और स्पष्ट टिप्पणियाँ कीं—
🔹 1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि
न्यायालय ने दोहराया कि Article 21 केवल शारीरिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा, सम्मान और भय-मुक्त जीवन भी शामिल है।
🔹 2. पुलिस की मनमानी पर सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट कहा—
“कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ कानून की रक्षक हैं, उत्पीड़क नहीं।”
बिना ठोस आधार के किसी व्यक्ति को बार-बार थाने बुलाना या मानसिक दबाव बनाना असंवैधानिक है।
🔹 3. दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही अस्वीकार्य
यदि किसी कार्यवाही का उद्देश्य न्याय नहीं बल्कि उत्पीड़न है, तो न्यायालय का हस्तक्षेप न केवल उचित बल्कि आवश्यक है।
🔹 4. राज्य को चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य को निर्देश दिया कि—
- भविष्य में ऐसी कार्रवाइयों से बचा जाए
- जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप हो
📌 अंतिम आदेश (Final Directions)
सुप्रीम कोर्ट ने—
- याचिकाकर्ताओं को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया
- बिना विधिक आवश्यकता के किसी भी दमनात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई
- संबंधित अधिकारियों को संविधान के अनुरूप कार्य करने का निर्देश दिया
📚 इस फैसले का कानूनी महत्व (Legal Significance)
यह निर्णय कई दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है—
- Article 21 की व्यापक व्याख्या को और सुदृढ़ करता है
- पुलिस शक्ति पर संवैधानिक नियंत्रण को स्पष्ट करता है
- झूठे या दुर्भावनापूर्ण मामलों से नागरिकों को प्रभावी संरक्षण देता है
- निचली अदालतों और पुलिस प्रशासन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करता है
🔍 पूर्व निर्णयों से संबंध
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निम्नलिखित ऐतिहासिक निर्णयों की भावना को आगे बढ़ाता है—
- Maneka Gandhi v. Union of India – Article 21 की विस्तृत व्याख्या
- Arnesh Kumar v. State of Bihar – मनमानी गिरफ्तारी पर रोक
- State of Haryana v. Bhajan Lal – दुर्भावनापूर्ण FIR के विरुद्ध दिशानिर्देश
🧠 निष्कर्ष (Conclusion)
Wazid & Ors. v. State of Uttar Pradesh & Ors. (2025) का निर्णय एक बार फिर यह स्थापित करता है कि—
राज्य की शक्ति संविधान से ऊपर नहीं है।
यह फैसला आम नागरिकों, अधिवक्ताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए एक मजबूत संदेश देता है कि यदि कानून का दुरुपयोग होगा, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करेगी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करेगी।
✍️ लेखक की टिप्पणी
यह लेख केवल शैक्षणिक एवं कानूनी सूचना के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी विशिष्ट मामले में कानूनी सलाह के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श अवश्य लें।
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❓ FAQ: Wazid बनाम State of Uttar Pradesh (2025)
1️⃣ यह केस किस बारे में है?
यह केस पुलिस की मनमानी कार्रवाई और आम नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उन्हें बिना ठोस वजह के परेशान किया जा रहा था।
2️⃣ यह फैसला कब और किस कोर्ट ने दिया?
यह फैसला 22 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने दिया।
3️⃣ इस केस में सबसे बड़ा मुद्दा क्या था?
सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि क्या पुलिस बिना पक्के सबूत और कानूनी प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को परेशान कर सकती है।
4️⃣ Article 21 का इस केस से क्या संबंध है?
Article 21 हर नागरिक को ज़िंदगी, सम्मान और आज़ादी का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस की मनमानी इस अधिकार का उल्लंघन है।
5️⃣ क्या पुलिस सिर्फ शक के आधार पर कार्रवाई कर सकती है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ शक के आधार पर किसी को बार-बार थाने बुलाना या डराना असंवैधानिक है।
6️⃣ सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को क्या संदेश दिया?
कोर्ट ने कहा—
“पुलिस जनता की रक्षक है, उत्पीड़क नहीं।”
पुलिस को कानून के दायरे में रहकर ही काम करना होगा।
7️⃣ कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को क्या राहत दी?
सुप्रीम कोर्ट ने—
-
याचिकाकर्ताओं को अंतरिम सुरक्षा दी
-
बिना ज़रूरत किसी भी दमनकारी कार्रवाई पर रोक लगाई
8️⃣ क्या कोर्ट ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है?
हाँ। अगर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, तो सुप्रीम कोर्ट दखल दे सकता है।
9️⃣ आम आदमी के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?
इस फैसले का मतलब है कि—
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पुलिस मनमानी नहीं कर सकती
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झूठे या दुर्भावनापूर्ण केस में राहत मिल सकती है
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संविधान आम नागरिक के साथ खड़ा है
🔟 अगर पुलिस बिना वजह परेशान करे तो क्या करें?
आप—
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उच्च अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं
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हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकते हैं
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संविधान के Article 21 और 14 का सहारा ले सकते हैं
1️⃣1️⃣ क्या यह फैसला पुराने मामलों से जुड़ा है?
हाँ। यह फैसला इन पुराने मामलों की सोच को आगे बढ़ाता है—
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Maneka Gandhi केस
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Arnesh Kumar केस
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Bhajan Lal केस
1️⃣2️⃣ क्या यह फैसला सभी राज्यों पर लागू होता है?
हाँ। सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरे देश में लागू होता है और सभी पुलिस अधिकारियों को इसका पालन करना होता है।
1️⃣3️⃣ क्या यह लेख कानूनी सलाह है?
नहीं। यह लेख केवल जानकारी के लिए है। किसी भी व्यक्तिगत मामले में वकील से सलाह लेना ज़रूरी है।
📌 संक्षेप में
Wazid बनाम State of UP (2025) का संदेश साफ है—
आम नागरिक की आज़ादी सबसे ऊपर है, और कानून का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
