झूठी FIR और झूठी गवाही के खिलाफ कानूनी कार्यवाही | Perjury Law in India

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झूठी FIR और अदालत में झूठी गवाही के खिलाफ कानूनी कार्यवाही

False FIR & Perjury Law in India (With Landmark Judgments)


परिचय

भारतीय दंड व्यवस्था में झूठी FIR दर्ज कराना तथा अदालत में झूठी गवाही (Perjury) देना केवल व्यक्तिगत विवाद का विषय नहीं है, बल्कि यह न्याय प्रशासन की पवित्रता पर सीधा आघात है। दुर्भाग्यवश, व्यावहारिक रूप से देखा जाता है कि कई मामलों में व्यक्तिगत रंजिश, राजनीतिक दबाव, संपत्ति विवाद, वैवाहिक कलह या बदले की भावना से निर्दोष व्यक्तियों को झूठे आपराधिक मामलों में फँसा दिया जाता है।

भारतीय विधि ऐसे कृत्यों को गंभीर अपराध मानती है और पीड़ित व्यक्ति को न केवल आत्म-रक्षा (Protection) बल्कि झूठा मामला दर्ज कराने वाले के विरुद्ध दंडात्मक एवं प्रतिकारी कार्यवाही का अधिकार भी प्रदान करती है।

यह लेख झूठी FIR और झूठी गवाही के विरुद्ध उपलब्ध सभी प्रभावी कानूनी उपायों, नवीन विधिक प्रावधानों (BNS/BNSS) तथा महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


1. झूठी FIR के विरुद्ध कानूनी राहत के उपाय

(क) वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को शिकायत (Fair Investigation)

यदि आपके विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण FIR दर्ज की गई है, तो आप—

  • पुलिस अधीक्षक (SP) / पुलिस आयुक्त (CP)
  • BNSS धारा 173(3) (पूर्व CrPC 154(3))

के अंतर्गत लिखित शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं और निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जाँच की माँग कर सकते हैं।

शिकायत के साथ संलग्न आवश्यक साक्ष्य

  • CCTV / वीडियो फुटेज
  • कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR)
  • लोकेशन डेटा
  • स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी
  • दस्तावेजी साक्ष्य

🔹 Landmark Judgment

Sakiri Vasu v. State of U.P. (2008) 2 SCC 409

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष जाँच प्रत्येक अभियुक्त का मौलिक अधिकार है और पुलिस अधिकारी मनमानी नहीं कर सकते।


2. अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail)

यदि गिरफ्तारी की आशंका हो, तो आप—

  • सत्र न्यायालय
  • उच्च न्यायालय

में अग्रिम जमानत की याचिका दायर कर सकते हैं।

🔹 Landmark Judgment

Sushila Aggarwal v. State (2020) 5 SCC 1

अग्रिम जमानत समय-सीमा से बंधी नहीं होती और झूठे मामलों में गिरफ्तारी से संरक्षण दिया जाना चाहिए।


3. FIR रद्द कराने की याचिका (Quashing of FIR)

यदि FIR—

  • प्रथम दृष्टया अपराध स्थापित नहीं करती
  • दुर्भावनापूर्ण है
  • निजी दुश्मनी का परिणाम है

तो आप उच्च न्यायालय में—

  • CrPC धारा 482
  • BNSS धारा 528

के अंतर्गत FIR रद्द कराने की याचिका दायर कर सकते हैं।

🔹 Landmark Judgment

State of Haryana v. Bhajan Lal, 1992 Supp (1) SCC 335

सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द करने के 7 सिद्धांत (Bhajan Lal Guidelines) निर्धारित किए, जो आज भी कानून का आधार हैं।


4. परजूरी (Perjury) क्या है?

परजूरी का अर्थ है—

अदालत में शपथ लेकर जानबूझकर झूठ बोलना, तथ्य छिपाना या झूठा हलफनामा प्रस्तुत करना।

विधिक प्रावधान

पुराना कानून (IPC)नया कानून (BNS)
धारा 191धारा 227
धारा 193धारा 229

सजा

  • 7 वर्ष तक का कारावास
  • जुर्माना

🔹 Landmark Judgment

Murray & Co. v. Ashok Kr. Newatia (2000) 2 SCC 367

झूठा हलफनामा देना न्यायालय की अवमानना के समान गंभीर अपराध है।


5. अदालत में झूठी गवाही के खिलाफ कार्यवाही

(धारा 340 CrPC / BNSS धारा 379-380)

झूठी गवाही के मामलों में सीधे FIR दर्ज नहीं की जा सकती

प्रक्रिया

  1. उसी न्यायालय में आवेदन
  2. न्यायालय प्रारंभिक जाँच करेगा
  3. यदि जानबूझकर झूठ सिद्ध हो
  4. न्यायालय स्वयं शिकायतकर्ता बनेगा

🔹 Landmark Judgment

Iqbal Singh Marwah v. Meenakshi Marwah (2005) 4 SCC 370

धारा 340 की कार्यवाही तभी होगी जब झूठ न्याय के हित को गंभीर रूप से प्रभावित करता हो।


6. झूठा केस दर्ज कराने वाले के खिलाफ प्रतिकारी कार्यवाही

(क) झूठा आपराधिक आरोप

  • IPC 211 → BNS 248
  • 2 से 7 वर्ष तक की सजा

(ख) पुलिस को झूठी सूचना

  • IPC 182 → BNS 217

(ग) मानहानि

  • आपराधिक मानहानि
  • दीवानी हर्जाना (Damages)

(घ) दुर्भावनापूर्ण अभियोजन

  • मानसिक उत्पीड़न
  • सामाजिक बदनामी
  • कानूनी खर्च की प्रतिपूर्ति

🔹 Landmark Judgment

West Bengal State Electricity Board v. Dilip Kumar Ray (2007) 14 SCC 568

दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए मुआवजा न्यायसंगत है।


निष्कर्ष

झूठी FIR और झूठी गवाही न्याय प्रणाली के दुरुपयोग का सबसे खतरनाक रूप है। भारतीय न्यायालयों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि—

“कानून का प्रयोग उत्पीड़न का साधन नहीं बनने दिया जा सकता।”

पीड़ित व्यक्ति को संवैधानिक संरक्षण, दंडात्मक कार्यवाही और मुआवजे का पूर्ण अधिकार है।


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महत्वपूर्ण विधिक सूचना

यह लेख केवल सामान्य विधिक जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है।
किसी भी कानूनी कार्यवाही से पूर्व अपने मामले के तथ्यों के अनुसार अनुभवी आपराधिक अधिवक्ता से परामर्श अवश्य लें।

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